श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  10.50.11 
एवं ध्यायति गोविन्द आकाशात् सूर्यवर्चसौ ।
रथावुपस्थितौ सद्य: ससूतौ सपरिच्छदौ ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
[शुकदेव गोस्वामी ने कहा] : भगवान गोविंद के इस तरह से चिंतन करते हुए दो रथ आकाश से अचानक उतरे। ये रथ सूर्य के समान तेजस्वी थे और सारथियों तथा आवश्यक सभी साज-सज्जा से पूर्ण थे।
 
[Sukadeva Goswami said]: While Lord Govinda was thinking like this, two chariots as bright as the sun suddenly descended from the sky. They were equipped with charioteers and ornaments.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस बात से सहमत हैं कि रथ स्वयं भगवान के निवास वैकुण्ठ-लोक, भगवान के राज्य से उतरे थे। भगवान के कट्टर भक्त भगवान की अतुलनीय प्रौद्योगिकी को देख कर बहुत प्रसन्न होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)