श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 5: नन्द महाराज तथा वसुदेव की भेंट  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.5.21 
तं द‍ृष्ट्वा सहसोत्थाय देह: प्राणमिवागतम् ।
प्रीत: प्रियतमं दोर्भ्यां सस्वजे प्रेमविह्वल: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जब नन्द महाराज ने सुना कि वसुदेव आ गये हैं, तो वे प्यार और स्नेह के वशीभूत हो गए और इतने प्रसन्न हुए जैसे उन्हें फिर से जीवन मिल गया हो। वसुदेव को अचानक सामने देखकर वे उठ खड़े हुए और दोनों भुजाओं से उन्हें गले लगाया।
 
When Nanda Maharaja heard that Vasudeva had come, he was overwhelmed with love and affection and was as happy as if he had regained life. Seeing Vasudeva suddenly present, he stood up and embraced him in his two arms.
तात्पर्य
नंद महाराज वसुदेव से आयु में बड़े थे। इसलिए नंद महाराज ने उन्हें गले लगाया और वसुदेव ने उन्हें नमस्कार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)