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bhagavat 10.49.7: अपने भाई अक्रूर के आने का फ़ायदा उठाते हुए कुन्ती देवी गोपनीय तौर पर उनके पास पहुँचीं। अपनी जन्मभूमि को याद करते हुए, उनकी आँखों में आँसू भर आए और वे बोलीं।   |   bhagavat अध्याय 10.49: अक्रूर का हस्तिनापुर जाना   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 49: अक्रूर का हस्तिनापुर जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  10.49.7 
पृथा तु भ्रातरं प्राप्तमक्रूरमुपसृत्य तम् ।
उवाच जन्मनिलयं स्मरन्त्यश्रुकलेक्षणा ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
अपने भाई अक्रूर के आने का फ़ायदा उठाते हुए कुन्ती देवी गोपनीय तौर पर उनके पास पहुँचीं। अपनी जन्मभूमि को याद करते हुए, उनकी आँखों में आँसू भर आए और वे बोलीं।
 
Taking advantage of her brother Akrur's arrival, Kuntidevi secretly went to him. Remembering her birthplace (maika), she spoke with tears in her eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)