श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 49: अक्रूर का हस्तिनापुर जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.49.22 
अधर्मोपचितं वित्तं हरन्त्यन्येऽल्पमेधस: ।
सम्भोजनीयापदेशैर्जलानीव जलौकस: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय आश्रितों के आड़ में, बाहरी लोग उस मूर्ख व्यक्ति के पाप से कमाई गई धन-दौलत को उसी तरह चुरा लेते हैं जैसे मछली के बच्चे उस पानी को पी जाते हैं जो मछली को जीवित रखता है।
 
Unknown people, disguised as dear dependents, steal the wealth of a foolish person, acquired through sin, just as the offspring of fish drink up the water that is supposed to sustain them.
तात्पर्य
सामान्य व्यक्ति सोचता है कि वह अपनी संपत्ति के बिना नहीं रह सकता, जबकि उसका इस संपत्ति पर अधिकार परिस्थितिजन्य और अस्थायी है। जैसे संपत्ति एक साधारण व्यक्ति को जीवन देती है, उसी प्रकार पानी एक मछली को जीवन देता है। हालाँकि, मनुष्य के प्रिय आश्रित उसकी संपत्ति चुरा लेते हैं, जैसे मछली के बच्चे पानी पीकर मछली का भरण-पोषण करने वाले पानी को पी जाते हैं। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर के शब्दों में, यह संसार "एक अजीब निवास" है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)