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bhagavat 10.48.34: निश्चय ही अम्बिका का दुर्बल चित्त वाला पुत्र धृतराष्ट्र अपने दुष्ट पुत्रों के वश में आ चुका है, इसलिए वह अंधा राजा अपने भाई के पुत्रों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं कर रहा है।   |   bhagavat अध्याय 10.48: कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 48: कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.48.34 
तेषु राजाम्बिकापुत्रो भ्रातृपुत्रेषु दीनधी: ।
समो न वर्तते नूनं दुष्पुत्रवशगोऽन्धद‍ृक् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही अम्बिका का दुर्बल चित्त वाला पुत्र धृतराष्ट्र अपने दुष्ट पुत्रों के वश में आ चुका है, इसलिए वह अंधा राजा अपने भाई के पुत्रों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं कर रहा है।
 
In reality, Ambika's weak-minded son Dhritarashtra has come under the control of his evil sons and hence the blind king is not behaving properly with his brother's sons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)