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bhagavat 10.48.31: इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कई तीर्थस्थलों में पवित्र नदियाँ हैं या देवताओं के मूर्तिरूप मिट्टी और पत्थर से बने होते हैं। लेकिन यह लंबे समय के बाद ही आत्मा को शुद्ध कर पाते हैं, जबकि संतों के दर्शन मात्र से आत्मा शुद्ध हो जाती है।   |   bhagavat अध्याय 10.48: कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 48: कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.48.31 
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामया: ।
ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधव: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कई तीर्थस्थलों में पवित्र नदियाँ हैं या देवताओं के मूर्तिरूप मिट्टी और पत्थर से बने होते हैं। लेकिन यह लंबे समय के बाद ही आत्मा को शुद्ध कर पाते हैं, जबकि संतों के दर्शन मात्र से आत्मा शुद्ध हो जाती है।
 
No one will deny that many places of pilgrimage have holy rivers or that the idols of the gods are made of clay and stone. But all these purify the soul only after a long period of time, whereas the soul becomes pure by merely seeing the saints.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)