सृजस्यथो लुम्पसि पासि विश्वं
रजस्तम:सत्त्वगुणै: स्वशक्तिभि: ।
न बध्यसे तद्गुणकर्मभिर्वा
ज्ञानात्मनस्ते क्व च बन्धहेतु: ॥ २१ ॥
अनुवाद
आप अपनी प्रचंड शक्तियों – रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण – से इस ब्रह्माण्ड का सृजन, संहार और पालन भी करते हैं। फिर भी आप इन गुणों द्वारा या इनके द्वारा उत्पन्न कर्मों द्वारा बँधे नहीं रहते। चूँकि आप सभी ज्ञान के मूल स्रोत हैं, तो फिर भ्रम के द्वारा आपके बँधे रहने का कारण क्या हो सकता है?
You also create, destroy and maintain this universe by Your personal powers, the modes of passion, ignorance and goodness. Yet You are not bound by these modes or by the actions which arise from them. Since You are the original source of all knowledge, what can then be the cause of Your bondage by attachment?
तात्पर्य
ज्ञानात्मनस्ते क्व च बंधहेतु: वाक्यांश, "चूँकि आप ज्ञानमय हैं, तो आपके लिए बंधन का कारण क्या हो सकता है?" निश्चित रूप से यह स्पष्ट करता है कि सर्व-ज्ञानी सर्वोच्च ईश्वर कभी भ्रम में नहीं रहता। इसलिए अवैयक्तिक सिद्धांत कि हम सभी ईश्वर हैं, लेकिन भूल गए हैं और अब भ्रम में हैं, उसका खंडन यहाँ श्रीमद् भागवतम के पृष्ठों में किया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥