Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.48.20: जिस प्रकार पञ्च मूल तत्व - पृथ्वी इत्यादि - सभी प्रजातियों में खुद को प्रचुर विविधता के रूप में चर और अचर जीवों को प्रकट करते हैं, ठीक उसी प्रकार आप, एक स्वतंत्र परम आत्मा, अपनी सृष्टि की विविधतापूर्ण वस्तुओं में बहुविध रूपों में प्रकट होते हैं। | bhagavat अध्याय 10.48: कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यथा हि भूतेषु चराचरेषु
मह्यादयो योनिषु भान्ति नाना ।
एवं भवान् केवल आत्मयोनि-
ष्वात्मात्मतन्त्रो बहुधा विभाति ॥ २० ॥
अनुवाद
जिस प्रकार पञ्च मूल तत्व - पृथ्वी इत्यादि - सभी प्रजातियों में खुद को प्रचुर विविधता के रूप में चर और अचर जीवों को प्रकट करते हैं, ठीक उसी प्रकार आप, एक स्वतंत्र परम आत्मा, अपनी सृष्टि की विविधतापूर्ण वस्तुओं में बहुविध रूपों में प्रकट होते हैं।
Just as the basic elements in sentient and inanimate beings manifest themselves in the form of many varieties, such as earth and the like, so You, as the independent Supersoul, manifest Yourself in many forms among the diverse substances of Your creation.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥