श्रीशुक उवाच
अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शन: ।
सैरन्ध्रया: कामतप्ताया: प्रियमिच्छन् गृहं ययौ ॥ १ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उद्धव का सन्देश सुनने के बाद समस्त प्राणियों के आत्मा परमेश्वर श्रीकृष्ण ने कामवासना से दु:खी दासी त्रिवक्रा को प्रसन्न करना चाहा। इसलिए वे उसके घर गये।
Sukadeva Goswami said: After internalizing Uddhava's message, Lord Krishna, the omniscient soul of all beings, wanted to satisfy the servant girl Trivakra who was suffering from sexual desire. So He went to her house.
तात्पर्य
यह पाठ प्रभु के मनोरंजनों की एक रोचक झलक देता है। पहली पंक्ति कहती है, अथ विज्ञ्ञाय भगवान: "इस प्रकार प्रभु ने [उद्धव का विवरण] समझा, ..." दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि भगवान कृष्ण हर चीज़ की आत्मा (सर्वआत्मा) हैं और हर चीज़ के देखने वाले (सर्व-दर्शनः) हैं। दूसरे शब्दों में, यद्यपि वे निश्चित रूप से दूतों की बोली गई रिपोर्ट पर निर्भर नहीं करते हैं, वे एक इंसान की भूमिका निभाते हैं और एक दूत से समाचार सुनते हैं - जरूरत से नहीं, जैसा कि हम करते हैं, लेकिन अपने आध्यात्मिक मनोरंजनों के आनंद में, साथ अपने शुद्ध भक्त के साथ प्रेम का आदान-प्रदान करते हैं। सर्व-दर्शनः शब्द यह भी इंगित करता है कि प्रभु ने व्रज के निवासियों की भावनाओं को पूरी तरह से समझा और उनके हृदय के भीतर उनके साथ पूरी तरह से मेलजोल रखा। अब, अपने बाहरी मनोरंजनों में, वे श्रीमती त्रिवक्रा को आशीर्वाद देने की इच्छा रखते थे, जो कि भौतिक वासना की बीमारी से मुक्त होने वाली थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥