श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  10.47.60 
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरते: प्रसाद:
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्या: ।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजवल्ल‍भीनाम् ॥ ६० ॥
 
 
अनुवाद
जब श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तो गोपियों को भगवान की बाहों का आलिंगन प्राप्त हुआ। ऐसा दिव्य अनुग्रह न तो लक्ष्मीजी को प्राप्त हुआ और न ही वैकुण्ठ की ललनाओं को। बेशक, कमल के फूल जैसी शारीरिक कांति और सुगंध से युक्त स्वर्गलोक की सबसे सुंदर बालाओं ने भी कभी ऐसी कल्पना तक नहीं की थी। तो फिर, उन सांसारिक महिलाओं के बारे में क्या कहा जाए जो भौतिक दृष्टि से बहुत सुंदर हैं?
 
When Sri Krishna was dancing with the gopis in the Raas Leela, the Lord's arms were embracing the gopis. Neither Lakshmiji nor the ladies of Vaikuntha ever received this divine grace. Undoubtedly, even the most beautiful girls of heaven, endowed with the physical radiance and fragrance of a lotus flower, never even imagined such a thing. Then what can be said about those worldly women who are extremely beautiful from the physical point of view?
तात्पर्य
इस पद्य के शब्दों का अर्थ और अनुवाद श्रील प्रभुपाद द्वारा चैतन्य-चरितामृत (मध्य 8.80) के अंग्रेजी अनुवाद से लिया गया है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती इस प्रकार टिप्पणी करते हैं: भगवान कृष्ण, सभी अवतारों में सर्वश्रेष्ठ, पवित्रता और नैतिकता के सर्वोच्च मंच पर विराजमान हैं, और इस प्रकार वह हमेशा सभी के द्वारा प्रशंसनीय रहे, यहाँ तक कि गाय चराने, जंगल में घूमने, युवा बंदरों के साथ भोजन करने, दही चुराने, अन्य पुरुषों की पत्नियों को बहलाने आदि के लिए सांसारिक आलोचना स्वीकार करने के दौरान भी। इसी तरह, गोपियाँ, जो भगवान की आनंद शक्ति से बनी हैं, उन्होंने भाग्य की देवियों की तुलना में भी पवित्रता और शुभता के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया, और इस प्रकार गोपियाँ अत्यधिक गौरवशाली हैं, भले ही उन्हें सांसारिक लोगों द्वारा आलोचना की जाती थी क्योंकि वे केवल गाय चराने वाली महिलाएं थीं जो जंगल में रहती थीं और स्पष्ट रूप से अनुचित तरीके से व्यवहार करती थीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)