श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  10.47.6 
अन्येष्वर्थकृता मैत्री यावदर्थविडम्बनम् ।
पुम्भि: स्‍त्रीषु कृता यद्वत् सुमन:स्विव षट्पदै: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
अन्य लोगों के प्रति, जो परिवार का सदस्य नहीं है, दिखाई जाने वाली मित्रता स्वार्थ से प्रेरित होती है। इसलिए, यह एक दिखावा है, जो तब तक चलता है जब तक कि किसी का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। ऐसी मित्रता वैसी ही है, जैसा कि पुरुषों की महिलाओं के प्रति या मधुमक्खियों की फूलों के प्रति लगाव होता है।
 
Friendship shown towards someone else who is not a family member is motivated by selfishness. Hence, it is just a facade which lasts till one's purpose is fulfilled. Such friendship is like the interest of men towards women or bees towards flowers.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर यहाँ बताते हैं कि आकर्षक महिलाएँ, फूलों की तरह, सुंदरता, सुगंध, कोमलता, आकर्षण इत्यादि से संपन्न होती हैं। और जैसे मधुमक्खियाँ केवल एक बार फूल का रस पीती हैं और फिर उसे छोड़कर किसी दूसरी मक्खी के पास चली जाती हैं, उसी प्रकार चंचल पुरुष सुंदर और समर्पित महिलाओं को छोड़कर अन्य सुखों के पीछे भागते हैं। यहाँ गोपियों द्वारा इस प्रवृत्ति की निंदा की गई है, जिन्होंने अपना हृदय पूरी तरह से श्री कृष्ण को दे दिया था। गोपियाँ केवल श्री कृष्ण के आनंद के लिए अपने आकर्षण का प्रदर्शन करना चाहती थीं, और अलगाव के दर्द में उन्होंने उनके साथ दोस्ती के इरादों पर सवाल उठाए।

ये प्रभु के दिव्य आनंद हैं। भगवान कृष्ण और गोपियाँ दोनों ही पूर्ण रूप से मुक्त आत्माएँ हैं, जो दिव्य प्रेमपूर्ण मामलों में लिप्त हैं। इसके विपरीत, हमारे तथाकथित प्रेमपूर्ण संबंध, आध्यात्मिक दुनिया में पूर्ण प्रेमपूर्ण संबंधों के विकृत प्रतिबिंब होने के कारण, वासना, लालच, अभिमान आदि से प्रदूषित होते हैं। सभी मुक्त आत्माओं की तरह, गोपियाँ - और निश्चित रूप से स्वयं भगवान कृष्ण - इन निम्न गुणों से हमेशा के लिए मुक्त हैं, और उनके गहन प्रेमपूर्ण संबंध विशेष रूप से निरपेक्ष भक्ति से प्रेरित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)