श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  10.47.3 
तं प्रश्रयेणावनता: सुसत्कृतं
सव्रीडहासेक्षणसूनृतादिभि: ।
रहस्यपृच्छन्नुपविष्टमासने
विज्ञाय सन्देशहरं रमापते: ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
विनय के साथ अपना सिर झुकाते हुए, गोपियों ने अपनी शर्मीली मुस्कुराहट और मीठे शब्दों से उद्धव का यथोचित सम्मान किया। वे उन्हें सुनसान जगह ले गईं, उन्हें आराम से बैठाया और तब उन्हें लक्ष्मीपति कृष्ण का सन्देशवाहक मानकर उनसे प्रश्न करने लगीं।
 
The gopis bowed their heads humbly and honoured Uddhava with their shy smiling glances and sweet words. They took him to a secluded place, made him sit comfortably and then started questioning him, considering him to be the messenger of Lakshmipati Krishna.
तात्पर्य
पवित्र गोपियाँ ने क्रुष्ण जी से आए दूत को देखकर उत्साहित हो गईं। जिस प्रकार उद्धव जी को वृंदावन में रहते हुए पता चला था, विशिष्ट गोपियाँ सिर्फ अपने प्रिय कृष्ण के बारे में ही सोच सकती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)