श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  10.47.29 
श्रीभगवानुवाच
भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्व‍‍चित् ।
यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्निर्जलं मही ।
तथाहं च मन:प्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रय: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "तुम सच में कभी भी मुझसे अलग नहीं होते, क्योंकि मैं सारी सृष्टि की आत्मा हूँ। जैसे जल, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, ये सभी तत्व प्रकृति में हर एक चीज में मौजूद हैं, वैसे ही मैं हर किसी के मन, जीवन ऊर्जा और इंद्रियों में और साथ ही भौतिक तत्वों और प्रकृति के गुणों में मौजूद हूँ।"
 
The Lord said, “You are never really separate from Me, for I am the Self of all creation. Just as the elements of nature—sky, air, fire, water and earth—are present in every created thing, so I am present in everyone’s mind, life and senses, and within the material elements and modes of nature.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी और श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, प्रभु के इस कथन की जो भाषा दार्शनिक प्रतीत होती है, उसका एक गहरा अर्थ है। परम प्रभु गुप्त रूप से गोपियों को बता रहे थे कि वे गोपियों के विशेष प्रेम के प्रति अपने प्रत्युत्तर के स्वरूप में न केवल सबकी रचना की आत्मा के रूप में उनके साथ हैं, अपितु उनके विशेष प्रेमी के रूप में भी हैं। इस पद की इस भावना में, गुण शब्द गोपियों के उन विशेष दिव्य गुणों को इंगित करता है, जिसने श्री कृष्ण को अपनी ओर आकर्षित किया था, और सर्वथा शब्द, जिसका यहाँ स्वयं भगवान कृष्ण के संदर्भ में स्वयं ही अनुवाद किया गया है (शब्द मुझे से सम्बन्धित है, जो कि करण कारक में है) का अर्थ सर्वथा या "पूरी तरह" भी समझा जाता है। दूसरे शब्दों में, एक अर्थ में यद्यपि भगवान कृष्ण अनुपस्थित थे, वे पूरी तरह से कभी भी अनुपस्थित नहीं हो सकते थे, क्योंकि अपने आध्यात्मिक रूप में वे गोपियों के हृदय और मन में हमेशा विराजमान रहते हैं।

कृष्ण, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व तथा अन्य पुस्तकों में, श्रील प्रभुपाद ने विस्तार से समझाया है कि भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों से स्वयं को अलग करने का कारण गोपियों के प्रेम को और अधिक प्रबल करना था और जैसे कि उद्धव ने कहा था, गोपियों के प्रेम की तीव्रता को अन्य भक्तों को बताकर उन्हें आशीर्वाद देना था। वास्तव में, प्रभु गोपियों के साथ आध्यात्मिक रूप से उपस्थित थे, क्योंकि वे उनके शाश्वत सहयोगी हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती आगे कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति यह निष्कर्ष निकालेंगे कि श्री कृष्ण द्वारा दार्शनिक भाषा का प्रयोग करने का अर्थ था कि प्रभु कृष्ण भगवद् भावना के मूल तत्वों को समझाते हुए गोपियों को मुक्ति की दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे थे। सत्य यह है कि गोपियाँ सबसे अधिक उन्नत मुक्त आत्माएँ हैं, और श्री कृष्ण के साथ उनके रासलीला के आनन्द को अधिकृत आचार्यों की सहायता से समझा जाना चाहिए। जब गोपियाँ रास नृत्य के लिए आयी थीं, श्री कृष्ण ने उन्हें कर्म-योग का उपदेश देने का प्रयास किया, सामान्य नैतिकता और आचार-व्यवहार पर ज़ोर दिया, परन्तु गोपियाँ उससे कहीं आगे थीं। उसी प्रकार, भगवान कृष्ण अब उन्हें ज्ञान-योग या आध्यात्मिक दर्शन प्रदान कर रहे हैं, परन्तु यह भी गोपियों के लिए अपर्याप्त है, जिन्होंने श्री कृष्ण के लिए सहज, निश्छल प्रेम प्राप्त कर लिया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)