कृष्ण, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व तथा अन्य पुस्तकों में, श्रील प्रभुपाद ने विस्तार से समझाया है कि भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों से स्वयं को अलग करने का कारण गोपियों के प्रेम को और अधिक प्रबल करना था और जैसे कि उद्धव ने कहा था, गोपियों के प्रेम की तीव्रता को अन्य भक्तों को बताकर उन्हें आशीर्वाद देना था। वास्तव में, प्रभु गोपियों के साथ आध्यात्मिक रूप से उपस्थित थे, क्योंकि वे उनके शाश्वत सहयोगी हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती आगे कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति यह निष्कर्ष निकालेंगे कि श्री कृष्ण द्वारा दार्शनिक भाषा का प्रयोग करने का अर्थ था कि प्रभु कृष्ण भगवद् भावना के मूल तत्वों को समझाते हुए गोपियों को मुक्ति की दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे थे। सत्य यह है कि गोपियाँ सबसे अधिक उन्नत मुक्त आत्माएँ हैं, और श्री कृष्ण के साथ उनके रासलीला के आनन्द को अधिकृत आचार्यों की सहायता से समझा जाना चाहिए। जब गोपियाँ रास नृत्य के लिए आयी थीं, श्री कृष्ण ने उन्हें कर्म-योग का उपदेश देने का प्रयास किया, सामान्य नैतिकता और आचार-व्यवहार पर ज़ोर दिया, परन्तु गोपियाँ उससे कहीं आगे थीं। उसी प्रकार, भगवान कृष्ण अब उन्हें ज्ञान-योग या आध्यात्मिक दर्शन प्रदान कर रहे हैं, परन्तु यह भी गोपियों के लिए अपर्याप्त है, जिन्होंने श्री कृष्ण के लिए सहज, निश्छल प्रेम प्राप्त कर लिया है।
