Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.46.39: इस संसार में कोई ऐसा कर्म शेष नहीं है जो उन्हें शुद्ध, अशुद्ध या मिश्रित योनियों में जन्म लेने के लिए मजबूर कर सके। फिर भी, वे अपने लीलाओं का आनंद लेने और अपने साधु-भक्तों का उद्धार करने के लिए स्वयं प्रकट होते हैं। | bhagavat अध्याय 10.46: उद्धव की वृन्दावन यात्रा । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न चास्य कर्म वा लोके सदसन्मिश्रयोनिषु ।
क्रीडार्थं सोऽपि साधूनां परित्राणाय कल्पते ॥ ३९ ॥
अनुवाद
इस संसार में कोई ऐसा कर्म शेष नहीं है जो उन्हें शुद्ध, अशुद्ध या मिश्रित योनियों में जन्म लेने के लिए मजबूर कर सके। फिर भी, वे अपने लीलाओं का आनंद लेने और अपने साधु-भक्तों का उद्धार करने के लिए स्वयं प्रकट होते हैं।
He has no karma left to perform in this world that can force him to take birth in pure, impure or mixed species. Even then, he appears himself to enjoy his pastimes and to liberate his saintly devotees.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥