सर्वार्थसम्भवो देहो जनित: पोषितो यत: ।
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मर्त्य: शतायुषा ॥ ५ ॥
अनुवाद
मनुष्य अपने शरीर से जीवन के सारे लक्ष्य प्राप्त कर सकता है और माता-पिता ही वो लोग हैं जो इस शरीर को जन्म देते और उसका पोषण करते हैं। इस प्रकार कोई भी इंसान, अपने माता-पिता की पूरी उम्र तक सेवा करके भी, अपने माता-पिता के ऋण को नहीं उतार सकता।
A human being can achieve all the goals of life through his body and it is his parents who give birth to this body and nurture it. Hence, no mortal being can repay the debt of his parents even after serving them for a full life of one hundred years.
तात्पर्य
यह कहने के बाद कि "तुम दोनों, हमारे माता-पिता और हम अपने अलगाव के कारण दुखी हुए हैं", कृष्ण अब कहते हैं कि उनके और बलराम के धार्मिक सिद्धांतों को उनके माता-पिता को संतुष्ट करने में विफल रहने के कारण खराब कर दिया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥