भगवानों ने सीखा- (1) गीत, गायन ; (2) वाद्य, संगीत वाद्ययंत्र बजाना; (3) नृत्य, नृत्य करना; (4) नाट्य, नाटक; (5) आलेख्य, पेंटिंग; (6) विशेषक-छेदन, चेहरे और शरीर को रंगीन मलहम और सौंदर्य प्रसाधनों से सजाना; (7) तंडुल-कुसुम-बली-विकार, चावल और फूलों से फर्श पर शुभ डिजाइन तैयार करना; (8) पुष्पास्तरण, फूलों का बिस्तर बनाना; (9) दशन-वसन-अंग-राग, अपने दाँतों, कपड़ों और अंगों को रंगना; (10) मणि-भूमिका-कर्म, फर्श को जवाहरात से जड़ना; (11) शय्या-रचना, बिस्तर को बिछाना; (12) उदक-वाद्य, जल के पात्रों को बजाना; (13) उदक-घात, पानी के छींटे उड़ाना; (14) चित्र-योग, रंगों को मिलाना; (15) माल्य-ग्रथन-विकल्प, माला तैयार करना; (16) शिखर-आपीड-योजन, सिर पर हेलमेट लगाना; (17) नेपथ्य-योग, ड्रेसिंग रूम में परिधान पहनना; (18) कर्ण-पत्र-भंग, कान की बाली को सजाना; (19) सुगंध-युक्त, सुगंधित पदार्थ लगाना; (20) भूषण-योजन, गहनों से सजाना; (21) ऐंद्रजाल, जादू-टोना करना; (22) कौचुमार-योग, भेष बदलने की कला; (23) हस्त-लाघव, हाथ की सफाई; (24) चित्र-शकापूप-भक्ष्य-विकार-क्रिया, विभिन्न प्रकार के सलाद, रोटी, केक और अन्य स्वादिष्ट भोजन तैयार करना; (25) पानाक-रस-रागा-असव-योजन, स्वादिष्ट पेय पदार्थ तैयार करना और लाल रंग के साथ मिश्रण करना; (26) सूची-वाय-कर्म, सिलाई और बुनाई; (27) सूत्र-क्रीडा, पतले धागों से पुतलों को नचाना; (28) वीणा-डमरुकवाद्य, एक ल्यूट और एक छोटे एक्स-आकार के ड्रम पर बजाना; (29) प्रहेलिका, पहेलियाँ बनाना और उन्हें सुलझाना; (29a) प्रतिमाला, छंदों को कैपिंग करना, या स्मृति या कौशल के परीक्षण के रूप में पद्य के लिए कविता पद्य का पाठ करना; (30) दुरवचक-योग, ऐसे कथन करना जिनका उत्तर देना दूसरों के लिए कठिन हो; (31) पुस्तक-वाचन, पुस्तकों को पढ़ना; और (32) नाटिकाख्यायिका-दर्शन, लघु नाटक करना और उपाख्यान लिखना।
कृष्ण और बलराम ने भी सीखा- (33) काव्य-समस्या-पूरण, पहेलीपूर्ण छंदों को सुलझाना; (34) पट्टिका-वेट्र-बाण-विकल्प, कपड़े की एक पट्टी और एक छड़ी से धनुष बनाना; (35) तर्कु-कर्म, एक तकली से सूत कातना; (36) तक्षण, बढ़ईगीरी; (37) वास्तु-विद्या, स्थापत्य कला; (38) रौप्य-रत्न-परीक्षा, चांदी और रत्नों का परीक्षण; (39) धातु-वाद, धातु विज्ञान; (40) मणि-राग-ज्ञान, विभिन्न रंगों के साथ रत्नों को रंगना; (41) आकर-ज्ञान, खनिज विज्ञान; (42) वृक्षायुर्वेद-योग, हर्बल दवा; (43) मेष-कुक्कुट-लावक-युद्ध-विधि, मेढ़ों, मुर्गे और बटेरों को प्रशिक्षित करने और उन्हें लड़ने में शामिल करने की कला; (44) शुक-सारिका-प्रलापन, नर और मादा तोतों को बोलने और मनुष्यों के सवालों का जवाब देने के लिए प्रशिक्षित करने का ज्ञान; (45) उत्सादन, एक व्यक्ति को मरहम से ठीक करना; (46) केश-मार्जन-कौशल, हेयरड्रेसिंग; (47) अक्षर-मुष्टिका-कथन, बिना देखे किसी पुस्तक में क्या लिखा है बताना, और दूसरे की मुट्ठी में क्या छिपा है बताना; (48) म्लेच्छित-कुटर्क-विकल्प, बर्बर या विदेशी कुतर्क बनाना; (49) देश-भाषा-ज्ञान, प्रांतीय बोलियों का ज्ञान; (50) पुष्प-शकटिका-निर्मिति-ज्ञान, फूलों से खिलौना गाड़ियाँ बनाने का ज्ञान; (51) यंत्र-मातृका, जादू वर्ग बनाना, सभी दिशाओं में एक ही योगफल तक जोड़ने वाली संख्याओं की व्यवस्था; (52) धारण-मातृका, ताबीज का उपयोग; (53) संवाच्य, वार्तालाप; (54) मानसी-काव्य-क्रिया, मानसिक रूप से छंदों की रचना करना; (55) क्रिया-विकल्प, साहित्यिक कृति या चिकित्सीय उपाय तैयार करना; (56) चलितक-योग, मंदिर बनाना; (57) अभिधान-कोष-छंद-ज्ञान, कोश-विद्या और काव्य मीटर का ज्ञान; (58) वस्त्र-गोपन, एक प्रकार के कपड़े को दूसरे की तरह दिखने के लिए छिपाना; (59) द्यूत-विशेष, जुए के विभिन्न रूपों का ज्ञान; (so) आकर्ष-क्रीडा, पासा खेलना; (61) बालक-क्रीडनक, बच्चों के खिलौनों से खेलना; (62) वैनायिकी विद्या, रहस्यमय शक्ति से अनुशासन लागू करना; (63) विजयिकी विद्या, विजय प्राप्त करना; और (64) वैतालिकी विद्या, भोर में संगीत के साथ अपने स्वामी को जगाना।
