श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  10.45.35-36 
सर्वं नरवरश्रेष्ठौ सर्वविद्याप्रवर्तकौ ।
सकृन्निगदमात्रेण तौ सञ्जगृहतुर्नृप ॥ ३५ ॥
अहोरात्रैश्चतु:षष्‍ट्या संयत्तौ तावती: कला: ।
गुरुदक्षिणयाचार्यं छन्दयामासतुर्नृप ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, पुरुष श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और बलराम, सभी विद्याओं के आदि प्रवर्तक होने के कारण, किसी भी विषय के व्याख्यान को एक ही बार सुनकर तुरंत समझ सकते थे। इस प्रकार, उन्होंने ध्यान लगाकर चौंसठ कलाओं और चातुर्यों को उतने ही दिनों और रातों में सीख लिया। उसके बाद, हे राजन, उन्होंने अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा देकर प्रसन्न किया।
 
O King, the best of men, Krishna and Balarama, being themselves the originators of all kinds of knowledge, could instantly assimilate any subject by listening to its explanation in one go. In this way, with concentrated mind, they learnt sixty-four arts and skills in the same number of days and nights. Thereafter, O King, they pleased their Guru by giving Guru-dakshina.
तात्पर्य
निम्नलिखित सूची उन चौसठ विषयों को समाहित करती है जिसमें भगवान कृष्ण और भगवान बलराम चौंसठ दिनों में पारंगत हो गए। अतिरिक्त जानकारी श्रील प्रभुपाद के "कृष्ण, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व" में प्राप्त की जा सकती है।

भगवानों ने सीखा- (1) गीत, गायन ; (2) वाद्य, संगीत वाद्ययंत्र बजाना; (3) नृत्य, नृत्य करना; (4) नाट्य, नाटक; (5) आलेख्य, पेंटिंग; (6) विशेषक-छेदन, चेहरे और शरीर को रंगीन मलहम और सौंदर्य प्रसाधनों से सजाना; (7) तंडुल-कुसुम-बली-विकार, चावल और फूलों से फर्श पर शुभ डिजाइन तैयार करना; (8) पुष्पास्तरण, फूलों का बिस्तर बनाना; (9) दशन-वसन-अंग-राग, अपने दाँतों, कपड़ों और अंगों को रंगना; (10) मणि-भूमिका-कर्म, फर्श को जवाहरात से जड़ना; (11) शय्या-रचना, बिस्तर को बिछाना; (12) उदक-वाद्य, जल के पात्रों को बजाना; (13) उदक-घात, पानी के छींटे उड़ाना; (14) चित्र-योग, रंगों को मिलाना; (15) माल्य-ग्रथन-विकल्प, माला तैयार करना; (16) शिखर-आपीड-योजन, सिर पर हेलमेट लगाना; (17) नेपथ्य-योग, ड्रेसिंग रूम में परिधान पहनना; (18) कर्ण-पत्र-भंग, कान की बाली को सजाना; (19) सुगंध-युक्त, सुगंधित पदार्थ लगाना; (20) भूषण-योजन, गहनों से सजाना; (21) ऐंद्रजाल, जादू-टोना करना; (22) कौचुमार-योग, भेष बदलने की कला; (23) हस्त-लाघव, हाथ की सफाई; (24) चित्र-शकापूप-भक्ष्य-विकार-क्रिया, विभिन्न प्रकार के सलाद, रोटी, केक और अन्य स्वादिष्ट भोजन तैयार करना; (25) पानाक-रस-रागा-असव-योजन, स्वादिष्ट पेय पदार्थ तैयार करना और लाल रंग के साथ मिश्रण करना; (26) सूची-वाय-कर्म, सिलाई और बुनाई; (27) सूत्र-क्रीडा, पतले धागों से पुतलों को नचाना; (28) वीणा-डमरुकवाद्य, एक ल्यूट और एक छोटे एक्स-आकार के ड्रम पर बजाना; (29) प्रहेलिका, पहेलियाँ बनाना और उन्हें सुलझाना; (29a) प्रतिमाला, छंदों को कैपिंग करना, या स्मृति या कौशल के परीक्षण के रूप में पद्य के लिए कविता पद्य का पाठ करना; (30) दुरवचक-योग, ऐसे कथन करना जिनका उत्तर देना दूसरों के लिए कठिन हो; (31) पुस्तक-वाचन, पुस्तकों को पढ़ना; और (32) नाटिकाख्यायिका-दर्शन, लघु नाटक करना और उपाख्यान लिखना।

कृष्ण और बलराम ने भी सीखा- (33) काव्य-समस्या-पूरण, पहेलीपूर्ण छंदों को सुलझाना; (34) पट्टिका-वेट्र-बाण-विकल्प, कपड़े की एक पट्टी और एक छड़ी से धनुष बनाना; (35) तर्कु-कर्म, एक तकली से सूत कातना; (36) तक्षण, बढ़ईगीरी; (37) वास्तु-विद्या, स्थापत्य कला; (38) रौप्य-रत्न-परीक्षा, चांदी और रत्नों का परीक्षण; (39) धातु-वाद, धातु विज्ञान; (40) मणि-राग-ज्ञान, विभिन्न रंगों के साथ रत्नों को रंगना; (41) आकर-ज्ञान, खनिज विज्ञान; (42) वृक्षायुर्वेद-योग, हर्बल दवा; (43) मेष-कुक्कुट-लावक-युद्ध-विधि, मेढ़ों, मुर्गे और बटेरों को प्रशिक्षित करने और उन्हें लड़ने में शामिल करने की कला; (44) शुक-सारिका-प्रलापन, नर और मादा तोतों को बोलने और मनुष्यों के सवालों का जवाब देने के लिए प्रशिक्षित करने का ज्ञान; (45) उत्सादन, एक व्यक्ति को मरहम से ठीक करना; (46) केश-मार्जन-कौशल, हेयरड्रेसिंग; (47) अक्षर-मुष्टिका-कथन, बिना देखे किसी पुस्तक में क्या लिखा है बताना, और दूसरे की मुट्ठी में क्या छिपा है बताना; (48) म्लेच्छित-कुटर्क-विकल्प, बर्बर या विदेशी कुतर्क बनाना; (49) देश-भाषा-ज्ञान, प्रांतीय बोलियों का ज्ञान; (50) पुष्प-शकटिका-निर्मिति-ज्ञान, फूलों से खिलौना गाड़ियाँ बनाने का ज्ञान; (51) यंत्र-मातृका, जादू वर्ग बनाना, सभी दिशाओं में एक ही योगफल तक जोड़ने वाली संख्याओं की व्यवस्था; (52) धारण-मातृका, ताबीज का उपयोग; (53) संवाच्य, वार्तालाप; (54) मानसी-काव्य-क्रिया, मानसिक रूप से छंदों की रचना करना; (55) क्रिया-विकल्प, साहित्यिक कृति या चिकित्सीय उपाय तैयार करना; (56) चलितक-योग, मंदिर बनाना; (57) अभिधान-कोष-छंद-ज्ञान, कोश-विद्या और काव्य मीटर का ज्ञान; (58) वस्त्र-गोपन, एक प्रकार के कपड़े को दूसरे की तरह दिखने के लिए छिपाना; (59) द्यूत-विशेष, जुए के विभिन्न रूपों का ज्ञान; (so) आकर्ष-क्रीडा, पासा खेलना; (61) बालक-क्रीडनक, बच्चों के खिलौनों से खेलना; (62) वैनायिकी विद्या, रहस्यमय शक्ति से अनुशासन लागू करना; (63) विजयिकी विद्या, विजय प्राप्त करना; और (64) वैतालिकी विद्या, भोर में संगीत के साथ अपने स्वामी को जगाना।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)