Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.45.32: सान्दीपनि जी इन दोनों आत्मसंयमी शिष्यों के विषय में बहुत ही उच्च विचार रखते थे। इन शिष्यों को उन्होंने बड़े ही संयोग से प्राप्त किया था। दोनों ही भगवान की भक्ति जैसी ही निष्ठा के साथ गुरु की सेवा करते थे। दोनों का ऐसा करना अन्यों के लिए एक निंदाहीन उदाहरण था कि आध्यात्मिक गुरु की कैसे पूजा की जाती है। | bhagavat अध्याय 10.45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सान्दीपनि जी इन दोनों आत्मसंयमी शिष्यों के विषय में बहुत ही उच्च विचार रखते थे। इन शिष्यों को उन्होंने बड़े ही संयोग से प्राप्त किया था। दोनों ही भगवान की भक्ति जैसी ही निष्ठा के साथ गुरु की सेवा करते थे। दोनों का ऐसा करना अन्यों के लिए एक निंदाहीन उदाहरण था कि आध्यात्मिक गुरु की कैसे पूजा की जाती है।
Sandipani thought very highly of these two self-controlled disciples whom he had accidentally acquired. Both of them served their Guru with devotion like God Himself and set a perfect example for others as to how to worship a spiritual master.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥