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bhagavat 10.45.30-31: अपनी ईश्वरीय चेतना को अपने मानवीय कार्यों से छुपाते हुए, ब्रह्मांड के ये सर्वज्ञ भगवानों ने, सभी ज्ञान और विज्ञान के उद्गम होते हुए भी, गुरु के आश्रम में रहने की इच्छा व्यक्त की। इस तरह वे काशी के निवासी और अवंती नगरी में रह रहे संदीपनि मुनि के पास पहुँचे।   |   bhagavat अध्याय 10.45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  10.45.30-31 
प्रभवौ सर्वविद्यानां सर्वज्ञौ जगदीश्वरौ ।
नान्यसिद्धामलं ज्ञानं गूहमानौ नरेहितै: ॥ ३० ॥
अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतु: ।
काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तिपुरवासिनम् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी ईश्वरीय चेतना को अपने मानवीय कार्यों से छुपाते हुए, ब्रह्मांड के ये सर्वज्ञ भगवानों ने, सभी ज्ञान और विज्ञान के उद्गम होते हुए भी, गुरु के आश्रम में रहने की इच्छा व्यक्त की। इस तरह वे काशी के निवासी और अवंती नगरी में रह रहे संदीपनि मुनि के पास पहुँचे।
 
Keeping their complete knowledge within themselves through their human like actions, these two omniscient Gods of the universe, being the origin of all branches of knowledge, expressed their desire to go and live in a Gurukul. Thus they reached Sage Sandipani, a resident of Kashi who was living in the city of Avanti.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)