श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.45.1 
श्रीशुक उवाच
पितरावुपलब्धार्थौ विदित्वा पुरुषोत्तम: ।
मा भूदिति निजां मायां ततान जनमोहिनीम् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: यह जानने पर कि उनके माता-पिता उनके ईश्वरीय वैभव से अवगत हो गए हैं, भगवान ने सोचा कि यह नहीं होने देना चाहिए। इसलिए उन्होंने अपनी योगमाया फैलाई, जो उनके भक्तों को मोहित करती है।
 
Sukadeva Goswami said: Knowing that His parents had become aware of His transcendental opulence, the Lord thought that this should not be allowed to happen. So He expanded His yogamaya, which enchants His devotees.
तात्पर्य
यदि वसुदेव और देवकी कृष्ण को सर्वशक्तिमान भगवान के रूप में देखते, तो उनके प्रति उनके बेटे के रूप में अत्यधिक प्रेम नष्ट हो जाता। भगवान कृष्ण ऐसा नहीं चाहते थे। इसके बजाय, भगवान माता-पिता और बच्चों के बीच के संबंध वात्सल्य-रस के परमानंदमय प्रेम का आनंद उनके साथ उठाना चाहते थे। जैसा कि श्रील प्रभुपाद अक्सर कहते थे, हालांकि हम सामान्यतः भगवान को सर्वोच्च पिता के रूप में सोचते हैं, कृष्ण भावना में हम भगवान के लीलाओं में प्रवेश कर सकते हैं और माता-पिता की भूमिका निभा सकते हैं, जिससे उनके लिए हमारा प्रेम तेज होता है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि जना शब्द का यहां "भक्त" के रूप में अनुवाद किया जा सकता है, जैसा कि छंद में है दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत-सेवनं जनः (भाग। 3.29.13)। वे आगे बताते हैं कि जना का अनुवाद "माता-पिता" के रूप में भी किया जा सकता है, क्योंकि जना क्रिया जन से ली गई है, जिसका हिंसक रूप (जन्मते) का अर्थ है "उत्पन्न करना या जन्म देना।" शब्द के इस अर्थ में (जैसे जन्मनी या जनाकौ में), जना-मोहिनी शब्द इंगित करता है कि भगवान अपनी आंतरिक भ्रामक शक्ति का विस्तार करने जा रहे थे ताकि वसुदेव और देवकी उन्हें फिर से अपने प्यारे बच्चे के रूप में प्यार करेंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)