श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 44: कंस वध  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.44.13 
पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिङ्ग-गूढ: पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्य: ।
गा: पालयन् सहबल: क्‍वणयंश्च वेणुंविक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्‍‍‍‍‍घ्रि: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
व्रज के भूमि-खण्ड कितने पवित्र हैं जहाँ आदि-भगवान् मनुष्य के वेश में विचरण करते हुए अनेक लीलाएँ करते हैं! अद्भुत ढंग से विभूषित वे जिनके चरण शिवजी तथा देवी रमा द्वारा पूजित हैं, वे बलराम के साथ गौवें चराते हुए अपनी वंशी बजाते हैं।
 
How sacred are the lands of Vraj where the Adi-Bhagwan roams around in the guise of a human being and performs various pastimes. He, who is wonderfully adorned with various types of forest garlands and whose feet are worshipped by Lord Shiva and Goddess Rama, plays his flute while grazing the cows with Balram.
तात्पर्य
इस श्लोक में सभा में उपस्थित भक्त महिलाएं मथुरा और वृंदावन में अंतर बताती हैं। उनका कहना है कि वृंदावन में कृष्ण अपनी सहेलियों और सखाओं के साथ आनंदमग्न रहते हैं, जबकि मथुरा में भगवान को पहलवानों द्वारा सताया जाता है। इस प्रकार महिलएं मथुरा की निंदा करती हैं क्योंकि उन्हें इस बात का दुख है कि वह कृष्ण को ऐसा कुश्ती मुकाबला करते देखती हैं जो उनके विचार से अनुचित है। बेशक, मथुरा भी भगवान के शाश्वत निवास स्थानों में से एक हैं, लेकिन यहां सभा में उपस्थित महिलाएं नाराज होकर अपने प्यार का इजहार करती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)