श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 43: कृष्ण द्वारा कुवलयापीड हाथी का वध  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  10.43.20 
निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जनामञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप ।
प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणानना:पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, नगरवासियों और आस-पास के जिलों से आए हुए लोग बगीचे में अपने-अपने स्थानों पर बैठकर जब दोनों परम पुरुषों को निहार रहे थे, तो उनके आनंद की शक्ति से उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं और उनके चेहरे खिल उठे। वे बिना संतुष्ट हुए उनके मुखमंडल के दर्शन का पान करते रहे।
 
O King, when the citizens and the people from the neighbouring districts saw the two Supreme Beings from their respective seats in the galleries, their eyes remained wide open and their faces lit up with the power of happiness. They kept on enjoying the sight of their faces without any satiation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)