श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 42: यज्ञ के धनुष का टूटना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.42.5 
ततस्तावङ्गरागेण स्ववर्णेतरशोभिना ।
सम्प्राप्तपरभागेन शुशुभातेऽनुरञ्जितौ ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
इन सर्वोत्तम अंगरागों का उपयोग करके, उनके शरीर अपने रंगों से विपरीत रंगों से सज गए, जिस कारण दोनों भगवान् अत्यधिक सुंदर दिखने लगे।
 
इन सर्वोत्तम अंगरागों का उपयोग करके, उनके शरीर अपने रंगों से विपरीत रंगों से सज गए, जिस कारण दोनों भगवान् अत्यधिक सुंदर दिखने लगे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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