| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ » अध्याय 42: यज्ञ के धनुष का टूटना » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 10.42.4  | रूपपेशलमाधुर्यहसितालापवीक्षितै: ।
धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोरनुलेपनम् ॥ ४ ॥ | | | | | | अनुवाद | | कृष्ण की मनोहरता, आकर्षण, मिठास, मुस्कान, बोली और दृष्टियों से विह्वल मन वाली त्रिवक्रा ने कृष्ण और बलराम को खूब सारा लेप भेंट कर दिया। | | | | कृष्ण की मनोहरता, आकर्षण, मिठास, मुस्कान, बोली और दृष्टियों से विह्वल मन वाली त्रिवक्रा ने कृष्ण और बलराम को खूब सारा लेप भेंट कर दिया। | | ✨ ai-generated | | |
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