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श्लोक 10.42.17  |
करेण वामेन सलीलमुद्धृतंसज्यं च कृत्वा निमिषेण पश्यताम् ।
नृणां विकृष्य प्रबभञ्ज मध्यतोयथेक्षुदण्डं मदकर्युरुक्रम: ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने बाएँ हाथ से उस धनुष को झट से उठा के भगवान उरुक्रम ने झट से कुछ ही पल में राजा के सिपाहियों के सामने ही डोरी चढ़ा दी। फिर ज़ोर-ज़ोर से डोरी को खींच के धनुष को तोड़ डाला, जैसे उग्र हाथी गन्ने को तोड़ता है। |
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| अपने बाएँ हाथ से उस धनुष को झट से उठा के भगवान उरुक्रम ने झट से कुछ ही पल में राजा के सिपाहियों के सामने ही डोरी चढ़ा दी। फिर ज़ोर-ज़ोर से डोरी को खींच के धनुष को तोड़ डाला, जैसे उग्र हाथी गन्ने को तोड़ता है। |
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