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श्लोक 10.42.1  |
श्रीशुक उवाच
अथ व्रजन् राजपथेन माधव:
स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम् ।
विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां
पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रद: ॥ १ ॥ |
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| अनुवाद |
| शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् माधव राजमार्ग से जा रहे थे तो उन्होंने एक युवती को देखा जिसका मुख आकर्षक था और वह सुगंधित लेपों का थाल लिए हुए जा रही थी। प्रेमानन्द दाता ने हँसकर उससे इस प्रकार पूछा। |
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| शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् माधव राजमार्ग से जा रहे थे तो उन्होंने एक युवती को देखा जिसका मुख आकर्षक था और वह सुगंधित लेपों का थाल लिए हुए जा रही थी। प्रेमानन्द दाता ने हँसकर उससे इस प्रकार पूछा। |
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