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bhagavat 10.41.28: मथुरा की नारियों ने कृष्ण के बारे में बार-बार सुना हुआ था, इसलिए जब उन्होंने उन्हें देखा तो उनके दिल पिघल गए। वे सम्मानित महसूस कर रही थीं कि कृष्ण ने उन पर अपनी नज़रों और मुस्कान की अमृत वर्षा की है। अपनी आँखों से उन्हें अपने दिलों में ले जाकर, वे सभी परमानंद के अवतार को गले लगाए, और हे शत्रुओं के विजेता! जैसे ही उन्हें रोमांच हुआ, वे उनके बिना होने वाले असीम कष्ट को भूल गईं।   |   bhagavat अध्याय 10.41: कृष्ण तथा बलराम का मथुरा में प्रवेश   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 41: कृष्ण तथा बलराम का मथुरा में प्रवेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.41.28 
द‍ृष्ट्वा मुहु: श्रुतमनुद्रुतचेतसस्तं
तत्प्रेक्षणोत्स्मितसुधोक्षणलब्धमाना: ।
आनन्दमूर्तिमुपगुह्य द‍ृशात्मलब्धं
हृष्यत्त्वचो जहुरनन्तमरिन्दमाधिम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
मथुरा की नारियों ने कृष्ण के बारे में बार-बार सुना हुआ था, इसलिए जब उन्होंने उन्हें देखा तो उनके दिल पिघल गए। वे सम्मानित महसूस कर रही थीं कि कृष्ण ने उन पर अपनी नज़रों और मुस्कान की अमृत वर्षा की है। अपनी आँखों से उन्हें अपने दिलों में ले जाकर, वे सभी परमानंद के अवतार को गले लगाए, और हे शत्रुओं के विजेता! जैसे ही उन्हें रोमांच हुआ, वे उनके बिना होने वाले असीम कष्ट को भूल गईं।
 
The women of Mathura had heard of Krishna again and again, and so their hearts melted at the sight of Him. They felt honoured that Krishna had showered His nectar of glances and laughter upon them. Taking Him into their hearts with their eyes, they embraced the very embodiment of all joy and, O Arindam!, as they were thrilled, they forgot the infinite pain caused by His absence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)