नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते
ह्यजादयोऽनात्मतया गृहीता: ।
अजोऽनुबद्ध: स गुणैरजाया
गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम् ॥ ३ ॥
अनुवाद
भौतिक प्रकृति और सृष्टि के अन्य तत्व निश्चित रूप से आपको उस रूप में नहीं जान सकते जिस रूप में आप हैं क्योंकि वे निष्क्रिय पदार्थ के क्षेत्र में प्रकट होते हैं। चूँकि आप प्रकृति के गुणों से परे हैं, इसलिए इन गुणों से बंधे हुए ब्रह्माजी भी आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाते हैं।
The entire material nature and these other elements of creation certainly cannot know You as You are, because You appear within the sphere of inanimate matter. Since You are beyond the modes of nature, even Brahma, who is bound by these modes, cannot know Your real form.
तात्पर्य
ईश्वर प्रकृति से परे है। जब तक हम भी भौतिक अस्तित्व की सीमित चेतना से परे नहीं जाते तब तक हम उसे नहीं जान सकते हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मा जो कि ब्रह्मांड में सबसे महान जीव है। वे भी तब तक सर्वोच्च को नहीं समझ सकते जब तक वे कृष्ण चेतना के शुद्ध मंच पर नहीं आते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥