श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 40: अक्रूर द्वारा स्तुति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.40.28 
सोऽहं तवाङ्‌घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं
तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये ।
पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग-
स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मति: स्यात् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, इस प्रकार पतित होकर मैं आपके चरणों में शरण लेने आया हूँ, क्योंकि, यद्यपि अपवित्र व्यक्ति आपके चरणों तक कभी नहीं पहुँच सकते, पर मैं सोचता हूँ कि आपकी कृपा से यह संभव हो सका है। हे कमल-नाभ भगवान्, जब किसी का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, तभी वह आपके शुद्ध भक्तों की सेवा करके आपके प्रति चेतना उत्पन्न कर सकता है।
 
हे प्रभु, इस प्रकार पतित होकर मैं आपके चरणों में शरण लेने आया हूँ, क्योंकि, यद्यपि अपवित्र व्यक्ति आपके चरणों तक कभी नहीं पहुँच सकते, पर मैं सोचता हूँ कि आपकी कृपा से यह संभव हो सका है। हे कमल-नाभ भगवान्, जब किसी का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, तभी वह आपके शुद्ध भक्तों की सेवा करके आपके प्रति चेतना उत्पन्न कर सकता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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