श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 40: अक्रूर द्वारा स्तुति  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  10.40.13-14 
अग्निर्मुखं तेऽवनिरङ्‍‍‍‍‍घ्रिरीक्षणं
सूर्यो नभो नाभिरथो दिश: श्रुति: ।
द्यौ: कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवा:
कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम् ॥ १३ ॥
रोमाणि वृक्षौषधय: शिरोरुहा
मेघा: परस्यास्थिनखानि तेऽद्रय: ।
निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति-
र्मेढ्रस्तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
अग्नि को आपका मुख, पृथ्वी को आपके पाँव, सूर्य को आपकी आँख और आकाश को आपकी नाभि माना जाता है। दिशाएँ आपकी श्रवण शक्ति हैं, प्रमुख देवता आपकी बाँहें हैं और समुद्र आपका पेट है। स्वर्ग को आपका सिर माना जाता है और हवा आपकी प्राणवायु और शारीरिक शक्ति है। वृक्ष और पौधे आपके शरीर के बाल हैं, बादल आपके सिर के बाल हैं, और पर्वत आपके अस्थियों और नाखूनों की तरह हैं। दिन और रात का गुजरना आपकी आँखों का झपकना है, मानव जाति का प्रवर्तक आपकी जननेन्द्रिय है, और वर्षा आपका वीर्य है।
 
अग्नि को आपका मुख, पृथ्वी को आपके पाँव, सूर्य को आपकी आँख और आकाश को आपकी नाभि माना जाता है। दिशाएँ आपकी श्रवण शक्ति हैं, प्रमुख देवता आपकी बाँहें हैं और समुद्र आपका पेट है। स्वर्ग को आपका सिर माना जाता है और हवा आपकी प्राणवायु और शारीरिक शक्ति है। वृक्ष और पौधे आपके शरीर के बाल हैं, बादल आपके सिर के बाल हैं, और पर्वत आपके अस्थियों और नाखूनों की तरह हैं। दिन और रात का गुजरना आपकी आँखों का झपकना है, मानव जाति का प्रवर्तक आपकी जननेन्द्रिय है, और वर्षा आपका वीर्य है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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