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श्लोक 10.4.8  |
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसु: सुताम् ।
अपोथयच्छिलापृष्ठे स्वार्थोन्मूलितसौहृद: ॥ ८ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने विकट स्वार्थ के कारण अपनी बहन से सारे सम्बन्ध तोड़ते हुए घुटनों के बल बैठे कंस ने नवजात शिशु के पाँवों को पकड़ा और उसे पत्थर पर पटकना चाहा। |
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| अपने विकट स्वार्थ के कारण अपनी बहन से सारे सम्बन्ध तोड़ते हुए घुटनों के बल बैठे कंस ने नवजात शिशु के पाँवों को पकड़ा और उसे पत्थर पर पटकना चाहा। |
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