श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.4.5 
बहवो हिंसिता भ्रात: शिशव: पावकोपमा: ।
त्वया दैवनिसृष्टेन पुत्रिकैका प्रदीयताम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
ओ मेरे भाई, तुमने नियति के वश में आकर मेरे कई सुंदर और अग्नि के समान चमकीले शिशुओं को पहले ही मार दिया है। लेकिन कृपया इस कन्या को छोड़ दो। इसे मुझे अपने उपहार के रूप में दे दो।
 
O brother, by chance you have already killed many of my beautiful and fire-like bright children. But please spare this girl. Give her to me as a gift.
तात्पर्य
यहाँ हम देखते हैं कि देवकी ने सबसे पहले कंस का ध्यान उसके अत्याचारपूर्ण कार्यों, उसके अपने कई पुत्रों की हत्या पर केन्द्रित किया। इसके बाद वह उसके साथ समझौता करना चाहती है यह कहकर कि उसने जो कुछ किया वह उसकी गलती नहीं है, बल्कि भाग्य ने ऐसा करना चाहा। फिर उसने उससे अपनी पुत्री को भेंट में देने की गुहार लगाई। देवकी एक क्षत्रिय की पुत्री थी और राजनीतिक खेल खेलना जानती थी। राजनीति में सफलता प्राप्त करने के विभिन्न तरीके हैं: पहला दमन (दम), फिर समझौता (साम) और उसके बाद उपहार की गुजारिश (दान)। देवकी ने सबसे पहले कंस पर उसके अपने बच्चों की निर्मम और क्रूरतापूर्ण हत्या करने के लिए सीधे हमला करके दमन की नीति अपनाई। फिर उसने यह कहकर समझौता किया कि यह उसकी गलती नहीं है, और फिर उसने उपहार की भीख माँगी। जैसा कि हम महाभारत या "ग्रेटर इंडिया" के इतिहास से सीखते हैं, शासक वर्ग, क्षत्रियों की पत्नियाँ और बेटियाँ राजनीतिक खेल जानती थीं, लेकिन हमने कभी नहीं पाया कि किसी महिला को मुख्य कार्यकारी का पद दिया गया हो। यह मनु-संहिता के आदेशों के अनुसार है, लेकिन दुर्भाग्य से मनु-संहिता का अब अपमान किया जा रहा है, और आर्यों, वैदिक समाज के सदस्य, कुछ नहीं कर सकते हैं। कलयुग का यही स्वरूप है।

भाग्य द्वारा नियत कुछ भी नहीं होता है।

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो

ना लभ्यते यद् भ्रमतम उपरि अधः

तद् लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं

कालेन सर्वत्र गभीर-रमहास

(भाग. 1.5.18)

देवकी अच्छी तरह से जानती थी कि क्योंकि उसके कई बच्चों की हत्या भाग्य द्वारा तय की गई थी, इसलिए कंस को दोष नहीं दिया जाना चाहिए। कंस को अच्छे निर्देश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उपदेशो हि मूर्खणाम् प्रकोपाय न शांत्ये (चाणक्य पंडित)। यदि किसी मूर्ख व्यक्ति को अच्छे निर्देश दिए जाते हैं, तो वह अधिक क्रोधी हो जाता है। इसके अलावा, एक क्रूर व्यक्ति सांप से भी ज्यादा खतरनाक होता है। एक सांप और एक क्रूर व्यक्ति दोनों क्रूर होते हैं, लेकिन एक क्रूर व्यक्ति अधिक खतरनाक होता है क्योंकि यद्यपि एक सांप को मंत्रों द्वारा मोहित किया जा सकता है या जड़ी-बूटियों द्वारा वश में किया जा सकता है, एक क्रूर व्यक्ति को किसी भी तरह से वश में नहीं किया जा सकता है। कंस का यही स्वभाव था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)