श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  10.4.45 
ते वै रज:प्रकृतयस्तमसा मूढचेतस: ।
सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यव: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
राग और अंधकार के गुणों से भरे हुए और अपने भले-बुरे का ज्ञान न होने के कारण वे असुर, जिनकी मौत उनके सिर पर मंडरा रही थी, संतों को सताना शुरू कर दिया।
 
Filled with the qualities of Rajo and Tamo and not knowing what would be good or bad for them, those demons, whose death was hovering over their heads, started tormenting the virtuous men.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद् गीता (2.13) में कहा गया है:

देहिनोऽस्मिन् यथा देहे

कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तर-प्राप्तिर्

धीरस्तत्र न मुह्यति

"जैसे यह शरीर बाल्यकाल से यौवनकाल और वृद्धावस्था में जाता रहता है, वैसे ही मृत्यु पर आत्मा दूसरे शरीर में जाती है। आत्म-साक्षात्कारी जीव इस परिवर्तन से विचलित नहीं होता है।" उद्धत व्यक्ति, जो आवेश और अज्ञानता से भरे हुए हैं, मूर्खतापूर्ण ढंग से वे काम करते हैं जो नहीं करने चाहिए (नूनं प्रमत्ताः कुर्वते विकर्म)। लेकिन व्यक्ति को गैर-जिम्मेदार कामों के नतीजे पता होने चाहिए, जैसा कि अगले श्लोक में बताया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)