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bhagavat 10.4.44: कंस के साथी ये राक्षस दूसरों को, खास तौर पर वैष्णवों को, सताने का हुनर रखते थे और जब चाहें, जैसे चाहें अपना रूप बदल सकते थे। कंस ने इन राक्षसों को चारों दिशाओं में जाकर साधुओं को सताने की इजाज़त दी और फिर अपने महल में चला गया।   |   bhagavat अध्याय 10.4: राजा कंस के अत्याचार   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  10.4.44 
सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान् ।
कामरूपधरान् दिक्षु दानवान् गृहमाविशत् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
कंस के साथी ये राक्षस दूसरों को, खास तौर पर वैष्णवों को, सताने का हुनर रखते थे और जब चाहें, जैसे चाहें अपना रूप बदल सकते थे। कंस ने इन राक्षसों को चारों दिशाओं में जाकर साधुओं को सताने की इजाज़त दी और फिर अपने महल में चला गया।
 
These demons, followers of Kansa, were adept at tormenting others, especially the Vaishnavas, and could assume any form they wished. Kansa went inside his palace after allowing these demons to go in all directions and torment the saintly persons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)