श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  10.4.42 
स हि सर्वसुराध्यक्षो ह्यसुरद्विड् गुहाशय: ।
तन्मूला देवता: सर्वा: सेश्वरा: सचतुर्मुखा: ।
अयं वै तद्वधोपायो यद‍ृषीणां विहिंसनम् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
हृदय में वास करने वाले परमात्मा स्वरूप भगवान विष्णु, असुरों के परम शत्रु हैं और इसीलिए उन्हें असुरद्विट् कहा जाता है। वे सभी देवताओं के नेता हैं, भगवान शिव और ब्रह्मा सहित सभी देवता उनकी सुरक्षा में रहते हैं। महान ऋषि, साधु और वैष्णव भी उन पर निर्भर हैं। इसलिए, वैष्णवों पर अत्याचार करना ही विष्णु को मारने का एकमात्र उपाय है।
 
Lord Vishnu, the Supreme Being who resides in the heart of every person, is the ultimate enemy of the demons and that is why he is called Asurdvit. He is the leader of all the gods because all the gods including Lord Shiva and Lord Brahma are living under his protection. Great sages, saints and Vaishnavas also depend on him. Therefore, harassing the Vaishnavas is the only way to kill Vishnu.
तात्पर्य
देवता और विशेषकर वैष्णव सर्वोच्च भगवान विष्णु के अंग हैं, क्योंकि वे हमेशा उनके आदेशों का पालन करते हैं (ओम तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः)। कंस के असुर भक्तों ने सोचा कि अगर वैष्णवों, संतों और ऋषियों को सताया जाए, तो विष्णु का मूल शरीर स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाएगा। इसलिए उन्होंने वैष्णव धर्म को दबाने का फैसला किया। असुर वैष्णवों को सताने के लिए लगातार संघर्ष करते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि वैष्णव धर्म फैले। वैष्णव केवल भक्ति सेवा का प्रचार करते हैं, कर्मियों, ज्ञानियों और योगियों को प्रोत्साहित नहीं करते, क्योंकि अगर किसी को भौतिक, सशर्त जीवन से मुक्त होना है, तो अंततः उसे वैष्णव बनना होगा। हमारा कृष्ण चैतन्य आंदोलन इस समझ के साथ निर्देशित है, और इसलिए असुर हमेशा इसे दबाने की कोशिश करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)