मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्म: सनातन: ।
तस्य च ब्रह्म गोविप्रास्तपो यज्ञा: सदक्षिणा: ॥ ३९ ॥
अनुवाद
सभी देवताओं का आधार भगवान विष्णु हैं जिनका वास केवल उन्हीं जगहों पर होता है जहाँ धर्म, संस्कृति, वेद, गायें, ब्राह्मण, तपस्या और दक्षिणायुत यज्ञ होते हैं।
The basis of all gods is Lord Vishnu who resides where there is religion, traditional culture, Vedas, cows, Brahmins, penance and Dakshinayut Yagya.
तात्पर्य
यहाँ सनातन-धर्म, शाश्वत धार्मिक सिद्धांतों का वर्णन है जिसमें ब्राह्मण संस्कृति, ब्राह्मण, यज्ञ और धर्म शामिल होने चाहिए। ये सिद्धांत विष्णु के राज्य की स्थापना करते हैं। विष्णु के राज्य, भगवान के राज्य के बिना कोई सुखी नहीं हो सकता। न ते विदुः स्वार्थ-गतिṁ हि विष्णुम्: इस राक्षसी सभ्यता में, दुर्भाग्य से लोग यह नहीं समझते हैं कि मानव समाज का स्वार्थ विष्णु में निहित है। दुराशयया ये बहिरर्थमानिनः: इस प्रकार वे एक निराशाजनक आशा में फँसे हुए हैं। लोग ईश्वर चेतना या कृष्ण चेतना के बिना खुश रहना चाहते हैं, क्योंकि उनका नेतृत्व अंधे नेता कर रहे हैं जो मानव समाज को अराजकता की ओर ले जा रहे हैं। कंस के आसुरी अनुयायी मानव सुख की पारंपरिक स्थिति को बाधित करना चाहते थे और इस तरह देवताओं, भक्तों और देवताओं को हराना चाहते थे। जब तक भक्त और देवता प्रबल नहीं होते, तब तक असुर बढ़ते रहेंगे और मानव समाज अराजक स्थिति में रहेगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥