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श्लोक 10.4.38  |
यथामयोऽङ्गे समुपेक्षितो नृभि-
र्न शक्यते रूढपदश्चिकित्सितुम् ।
यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथा
रिपुर्महान् बद्धबलो न चाल्यते ॥ ३८ ॥ |
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| अनुवाद |
| रोग के समान ही, प्रारम्भ में उपेक्षा करने पर वह उग्र हो उठता है और साध्य नहीं रह पाता और जिस प्रकार आरम्भ में इन्द्रियों पर नियंत्रण न करने पर कालान्तर में उन्हें वश में नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार आरम्भ में यदि शत्रु की उपेक्षा की जाए तो बाद में वह दुर्गतिम हो जाता है। |
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| रोग के समान ही, प्रारम्भ में उपेक्षा करने पर वह उग्र हो उठता है और साध्य नहीं रह पाता और जिस प्रकार आरम्भ में इन्द्रियों पर नियंत्रण न करने पर कालान्तर में उन्हें वश में नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार आरम्भ में यदि शत्रु की उपेक्षा की जाए तो बाद में वह दुर्गतिम हो जाता है। |
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