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श्लोक 10.4.36  |
किं क्षेमशूरैर्विबुधैरसंयुगविकत्थनै: ।
रहोजुषा किं हरिणा शम्भुना वा वनौकसा ।
किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता ॥ ३६ ॥ |
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| अनुवाद |
| देवता युद्ध के मैदान से दूर रहकर बेकार में ही डींगें हांकते हैं। वो सिर्फ उन्हीं जगहों पर अपना पराक्रम दिखा सकते हैं जहाँ युद्ध नहीं होता है। इसलिए हमें ऐसे देवताओं से बिल्कुल भी नहीं डरना चाहिए। जहाँ तक भगवान् विष्णु की बात है, तो वो तो योगियों के दिलों की गहराईयों में एकांत में रहते हैं। और भगवान् शिव जंगल में चले गए हैं। ब्रह्मा तो हमेशा तप और ध्यान में ही लीन रहते हैं। इंद्र और बाकी सारे देवता पराक्रमहीन हैं। इसलिए आपको डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। |
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| देवता युद्ध के मैदान से दूर रहकर बेकार में ही डींगें हांकते हैं। वो सिर्फ उन्हीं जगहों पर अपना पराक्रम दिखा सकते हैं जहाँ युद्ध नहीं होता है। इसलिए हमें ऐसे देवताओं से बिल्कुल भी नहीं डरना चाहिए। जहाँ तक भगवान् विष्णु की बात है, तो वो तो योगियों के दिलों की गहराईयों में एकांत में रहते हैं। और भगवान् शिव जंगल में चले गए हैं। ब्रह्मा तो हमेशा तप और ध्यान में ही लीन रहते हैं। इंद्र और बाकी सारे देवता पराक्रमहीन हैं। इसलिए आपको डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। |
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