श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  10.4.30 
आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रव: ।
देवान् प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदा: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
अपने मालिक के कथन को सुनकर, देवताओं के शत्रु और अपने कार्यों में निपुण न होने वाले ईर्ष्यालु असुरों ने कंस को निम्नलिखित सलाह दी।
 
Hearing their master's words, the jealous Asuras, enemies of the gods and inefficient in their work, gave this advice to Kamsa.
तात्पर्य
मनुष्य दो प्रकार का होता है- असुर और सुर।

dvau bhūta-sargau loke ’smin

daiva āsura eva ca

viṣṇu-bhaktaḥ smṛto daiva

āsuras tad-viparyayaḥ

(पद्म पुराण)

जो भगवान विष्णु और कृष्ण के भक्त होते हैं, वे देव या सुर कहलाते हैं। वहीँ जो भक्तों के विरोधी होते हैं, उन्हें असुर कहते हैं। भक्त सभी कार्यों में निपुण होते हैं (यस्यास्ति भक्ति भगवति अकिंचना सर्वैर् गुणैस्तत्र समासते सुराः)। इसलिए उन्हें कोविद कहा जाता है जिसका अर्थ है "विशेषज्ञ"। हालाँकि, असुर जो जोशीले कामों में सतही तौर पर महारत दिखाते हैं, वे दरअसल मूर्ख होते हैं। वे न तो विवेकी होते हैं और न ही निपुण। वे जो कुछ भी करते हैं वह अधूरा होता है। मोघाशा मोग-कर्मणः। भगवद् गीता (9.12) में असुरों का वर्णन किया गया है कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह अंततः विफल हो जाता है। कंस को सलाह देने वाले ऐसे ही लोग थे क्यूँकि वे उसके प्रमुख मित्र और मंत्री थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)