स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वल: ।
सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धज: ॥ ३ ॥
अनुवाद
कंस तुरंत खाट से यह सोचते हुए उठा कि मेरा वध करने के लिए काल ही बालक रूप में जन्म ले लिया है! इस प्रकार विचलित एवं सिर के बाल बिखरे हुए कंस तुरन्त उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ शिशु ने जन्म लिया था।
Kansa immediately got up from the bed thinking, “Here is Death, who has taken birth to kill me.” Thus agitated and with the hair on his head dishevelled, Kansa immediately reached the place where the child was born.
तात्पर्य
काल शब्द महत्वपूर्ण है। यद्यपि यह बालक कंस को मारने के लिए ही जन्म लिया था, कंस ने सोचा था कि यह बच्चे को मारने का उचित समय है जिससे वह स्वयं बच जाएँगे। काल वास्तव में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का एक और नाम है जब वह केवल मारने के उद्देश्य से प्रकट होते हैं। जब अर्जुन ने कृष्ण से उनके सार्वभौमिक रूप में पूछा, "आप कौन हैं?" प्रभु ने खुद को काल, मृत्यु के रूप में प्रकट किया, जो मारने के लिए हैं। प्रकृति के नियम से, जब जनसंख्या में अवांछित वृद्धि होती है, काल प्रकट होते हैं, और भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की कुछ व्यवस्था से, लोग युद्ध, महामारी, अकाल आदि विभिन्न तरीकों से थोक में मारे जाते हैं। उस समय, नास्तिक राजनीतिक नेता भी भगवान या देवताओं द्वारा सुरक्षा के लिए किसी चर्च, मस्जिद या मंदिर जाते हैं और विनम्रतापूर्वक कहते हैं, "भगवान चाहे तो।" इससे पहले, वे भगवान पर कोई ध्यान नहीं देते, भगवान या उनकी इच्छा को जानने की परवाह नहीं करते, लेकिन जब काल प्रकट होता है, तो वे कहते हैं "भगवान चाहे तो।" मृत्यु भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के सर्वोच्च काल की एक विशेषता है। मृत्यु के समय, नास्तिक को इस सर्वोच्च काल के सामने झुकना पड़ता है, और फिर भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व उससे उसकी सभी संपत्ति ले लेता है (मृत्युः सर्व-हरश्चाहम्) और उसे दूसरा शरीर स्वीकार करने के लिए मजबूर करता है (तथा देहान्तर-प्राप्तिः)। नास्तिक लोग यह नहीं जानते हैं, और यदि वे जानते हैं, तो भी वे इसकी उपेक्षा करते हैं ताकि वे अपने सामान्य जीवन के साथ चल सकें। कृष्ण चेतना आंदोलन उन्हें यह सिखाने की कोशिश कर रहा है कि यद्यपि कुछ वर्षों के लिए कोई महान रक्षक या महान चौकीदार के रूप में कार्य कर सकता है, काल की उपस्थिति में, मृत्यु, प्रकृति के नियमों से उन्हें दूसरा शरीर अवश्य लेना होगा। इसे न जानते हुए, वे अपना समय अनावश्यक रूप से चौकीदार के रूप में अपने व्यवसाय में बर्बाद करते हैं और भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की दया पाने की कोशिश नहीं करते। जैसा कि स्पष्ट रूप से कहा गया है, अप्राप्य माम निवर्तन्ते मृत्यु-संसार-वर्तमानी: कृष्ण चेतना के बिना, जन्म और मृत्यु में भटकते रहने के लिए निंदा की जाती है, न जाने अपने अगले जन्म में क्या होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥