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श्लोक 10.4.3  |
स तल्पात् तूर्णमुत्थाय कालोऽयमिति विह्वल: ।
सूतीगृहमगात् तूर्णं प्रस्खलन् मुक्तमूर्धज: ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| कंस तुरंत खाट से यह सोचते हुए उठा कि मेरा वध करने के लिए काल ही बालक रूप में जन्म ले लिया है! इस प्रकार विचलित एवं सिर के बाल बिखरे हुए कंस तुरन्त उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ शिशु ने जन्म लिया था। |
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| कंस तुरंत खाट से यह सोचते हुए उठा कि मेरा वध करने के लिए काल ही बालक रूप में जन्म ले लिया है! इस प्रकार विचलित एवं सिर के बाल बिखरे हुए कंस तुरन्त उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ शिशु ने जन्म लिया था। |
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