श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.4.27 
शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विता: ।
मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्द‍ृश: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
भेदभावपूर्ण दृष्टि रखने वाले लोग शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह और मद जैसे भौतिक गुणों से घिरे रहते हैं। वे उस निकट के कारण से प्रभावित होते हैं जिसका वे निवारण करने में लगे रहते हैं क्योंकि उन्हें दूरस्थ, परम कारण, ईश्वर व्यक्तित्व का कोई ज्ञान नहीं होता।
 
People with a discriminatory attitude are endowed with material qualities like grief, joy, fear, hatred, greed, delusion and pride. They are influenced by the immediate cause (upadana) which they try to eliminate because they have no knowledge of the remote ultimate cause (nimitta karana) i.e. God.
तात्पर्य
कृष्ण ही सभी कारणों के कारण हैं (सर्व-कारण-कारणम्), परन्तु जिसका कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह तुरन्त होने वाले कारणों से विचलित हो जाता है और वह वियोग या भेद के अपने दृष्टिकोण को रोक नहीं सकता। जब कोई विशेषज्ञ वैद्य किसी रोगी का इलाज करता है, तो वह बीमारी के मूल कारण को खोजने की कोशिश करता है और वह मूल कारण के लक्षणों से नहीं बहकता। इसी तरह, एक भक्त कभी भी जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों से विचलित नहीं होता। तत तेऽनुकम्पाम् सुसमीक्षमाणः (भा० १०.१४.८)।एक भक्त यह समझता है कि जब वह संकट में होता है, तो यह उसके अपने पिछले कुकर्मों के कारण होता है, जो कि अब प्रतिक्रिया में फलित हो रहे हैं, हालाँकि भगवान की कृपा से ये बहुत ही हल्के होते हैं। कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्ति-भाजाम् (ब्रह्म-संहिता ५.५४)। जब भगवान की शरण में आये हुए किसी भक्त को अपने पिछले कर्मों की गलतियों के कारण दुख भोगना पड़ता है, तो वह भगवान की कृपा से बहुत कम दुखों से गुजरता है। हालाँकि किसी भक्त की बीमारी अतीत में कब हुई गलतियों के कारण होती है, वह ऐसे दुखों को सहन करने और सहन करने के लिए सहमत हो जाता है, और वह पूरी तरह से भगवान पर निर्भर रहता है। इस प्रकार वह कभी भी विलाप, उल्लास, भय आदि की भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता है। एक भक्त कभी भी कुछ भी भगवान से असंबंधित नहीं देखता। श्रील माधवाचार्य, भावष्य पुराण से उद्धृत करते हुए कहते हैं:

भगवद्-दर्शनाद् यस्य

विरोधाद् दर्शनं पृथक्

पृथग्-दृष्टिः स विज्ञेयो

न तु सद-भेद-दर्शनाः

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)