श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  10.4.26 
एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम् ।
अज्ञानप्रभवाहंधी: स्वपरेति भिदा यत: ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
हे महान व्यक्तित्व कंस, सिर्फ़ अज्ञानवश ही मनुष्य भौतिक शरीर और शारीरिक अहंकार को स्वीकार करता है। इस दर्शन के बारे में आपने जो कहा है वह सही है। जीवन के शारीरिक स्वरूप की अवधारणा रखने वाले लोग आत्म-साक्षात्कार से वंचित होते हैं, वे "यह मेरा है" और "यह किसी और का है" के संदर्भ में भेदभाव करते हैं।
 
O great man Kamsa, it is only due to the influence of ignorance that man accepts the material body and ego. What you have said about this philosophy is correct. Persons with bodily-consciousness, devoid of self-knowledge, discriminate in the form of “This is mine,” “This is someone else’s.”
तात्पर्य
सब कुछ स्वत: ही प्रकृति के नियमों से होता है, जो भगवान के निर्देशन में कार्य करते हैं। कुछ भी स्वतंत्र रूप से करने का प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि जो स्वयं को इस भौतिक वातावरण में डाल देता है, वह पूरी तरह से प्रकृति के नियमों के अधीन होता है। इसलिए, हमारा मुख्य कार्य इस वातानुकूलित जीवन से बाहर निकलना और फिर से आध्यात्मिक अस्तित्व में स्थित होना चाहिए। केवल अज्ञानता के कारण ही व्यक्ति सोचता है, "मैं एक देवता हूँ," "मैं एक मनुष्य हूँ," "मैं एक कुत्ता हूँ," "मैं एक बिल्ली हूँ," या, जब अज्ञानता और भी अधिक उन्नत हो जाती है, "मैं भगवान हूँ।" जब तक कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से आत्म-साक्षात्कार नहीं कर लेता, तब तक उसका अज्ञानता का जीवन जारी रहेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)