श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.4.22 
यावद्धतोऽस्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वद‍ृक् ।
तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
देहात्मबुद्धि के कारण आत्मबोध के अभाव में मनुष्य अँधेरे में रहता है और यह मानता है कि "मैं मारा जा रहा हूँ" या "मैंने अपने शत्रुओं को मार डाला है।" जब तक कोई मूर्ख व्यक्ति स्वयं को हत्यारा या मारा गया समझता है तब तक वह भौतिक उत्तरदायित्वों में बंधा रहता है और उसे सुख और दुख का अनुभव करना पड़ता है।
 
When a person is in the body and does not have self-realization, he remains in the dark, thinking, “I am being killed” or “I have killed my enemies.” As long as a foolish person thinks of himself as the killer or the one who has been killed, he remains in material bondage and has to experience pleasure and pain.
तात्पर्य
भगवान की कृपा से कंस को अनुपयुक्त रूप से देवकी और वसुदेव जैसी वैष्णवों को सताने पर सच्चा पश्चाताप हुआ, और इस प्रकार वह ज्ञान के दिव्य स्तर पर आ गया। "क्योंकि मैं ज्ञान के मंच पर स्थित हूं," कंस ने कहा, "यह समझते हुए कि मैं आपके पुत्रों का हत्यारा बिल्कुल नहीं हूं, उनकी मृत्यु के लिए मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। जब तक मैं सोचता था कि मैं आपके पुत्र द्वारा मारा जाऊंगा, मैं अज्ञानता में था, लेकिन अब मैं इस अज्ञानता से मुक्त हूं, जो जीवन की शारीरिक अवधारणा के कारण था।" जैसा कि भगवद्-गीता (18.17) में कहा गया है: यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते हत्वाऽपि स इमांल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते "जो झूठे अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं है, यद्यपि वह इस लोक में मनुष्यों को मारता है, वह हत्यारा नहीं है। न ही वह अपने कर्मों से बंधा है।" इस स्वयंसिद्ध सत्य के अनुसार, कंस ने निवेदन किया कि वह देवकी और वसुदेव के पुत्रों को मारने के लिए ज़िम्मेदार नहीं था। "कृपया ऐसी झूठी, बाहरी गतिविधियों के लिए मुझे क्षमा करने का प्रयास करें," उन्होंने कहा, "और इसी ज्ञान के साथ शांत हो जाएं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)