श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  10.4.20 
यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्यय: ।
देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति शरीर और आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को नहीं समझता, वह देह से ही अपने अस्तित्व को जोड़कर देखता है और उससे अत्यधिक जुड़ाव महसूस करता है। नतीजतन, शरीर और उसके प्रतिफलों के प्रति लगाव के कारण, वह अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ मिलन और अलगाव का अनुभव करता रहता है। जब तक यह लगाव बना रहता है, तब तक वह इस भौतिक जगत में बंधा रहता है और अपने जीवन को इसी तरह से व्यतीत करता रहता है। लेकिन अगर वह इस लगाव से मुक्त हो जाता है, तो वह इस भौतिक दुनिया से स्वतंत्र हो जाता है और उसे मोक्ष मिल जाता है।
 
A person who does not understand the natural state of the body and soul is very attached to the bodily consciousness. As a result, due to attachment to the body and its results, he experiences union and separation with his family, society and nation. As long as this continues, he lives a material life (otherwise he is liberated).
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (1.2.6) में पुष्टि की गई है:

स वै पुंसां परो धर्मो

यतो भक्तिरधोक्षजे

अहैतुकी अप्रतिहता

ययात्मा सुप्रसीदति

'धर्म' शब्द का अर्थ है "व्यस्तता"। जो भगवान की सेवा में लगा हुआ है (यतो भक्तिरधोक्षजे), बिना किसी बाधा और बिना रुकावट के, उसे अपनी मूल, आध्यात्मिक स्थिति में स्थित माना जाता है। जब व्यक्ति को इस स्थिति में पदोन्नत किया जाता है, तो वह हमेशा पारलौकिक आनंद में खुश रहता है। अन्यथा, जब तक कोई जीवन की शारीरिक अवधारणा में है, तब तक उसे भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। जन्म-मृत्यु जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शन। शरीर जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के अपने सिद्धांतों के अधीन है, लेकिन जो आध्यात्मिक जीवन में स्थित है (यतो भक्तिरधोक्षजे) उसका कोई जन्म नहीं है, कोई मृत्यु नहीं है, कोई बुढ़ापा नहीं है और कोई बीमारी नहीं है। कोई तर्क दे सकता है कि हम एक ऐसे व्यक्ति को देख सकते हैं जो चौबीस घंटे आध्यात्मिक रूप से व्यस्त रहता है लेकिन फिर भी बीमारी से पीड़ित है। हालाँकि, वास्तव में, वह न तो पीड़ित है और न ही रोगग्रस्त है; अन्यथा वह चौबीस घंटे आध्यात्मिक गतिविधियों में व्यस्त नहीं रह सकता था। उदाहरण इस संबंध में दिया जा सकता है कि कभी-कभी गंगा के पानी में गंदा झाग या कचरा तैरता हुआ दिखाई देता है। इसे नीर-धर्म कहा जाता है, जो पानी का एक कार्य है। लेकिन जो गंगा में जाता है, वह पानी में तैरते झाग और गंदी चीजों का बुरा नहीं मानता। वह अपने हाथ से ऐसी गंदी चीजों को दूर करता है, गंगा में स्नान करता है और लाभकारी परिणाम प्राप्त करता है। इसलिए, जो जीवन की आध्यात्मिक स्थिति में स्थित है, वह झाग और कचरे से अप्रभावित रहता है - या कोई भी सतही गंदी चीजें। इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी ने की है:

ईहा यस्य हरिर्दास्ये

कर्मणा मनसा गिरा

निखिलास्वप्यवस्थासु

जीवन्मुक्तः स उच्यते

"कृष्ण की सेवा में अपने शरीर, मन और शब्दों से कार्य करने वाला व्यक्ति एक मुक्त व्यक्ति है, यहाँ तक कि भौतिक दुनिया में भी।" (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.187) इसलिए, किसी को गुरु को एक सामान्य इंसान मानने से मना किया गया है (गुरुषु नर-मती ... नारकी सः)। आध्यात्मिक गुरु, या आचार्य, हमेशा जीवन की आध्यात्मिक स्थिति में स्थित होते हैं। जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग उस पर कोई असर नहीं डालते। इसलिए, हरि-भक्ति-विलास के अनुसार, आचार्य के शरीर को दफनाने के बाद उसका शरीर कभी भस्म नहीं किया जाता, क्योंकि यह एक आध्यात्मिक शरीर होता है। आध्यात्मिक शरीर हमेशा भौतिक परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)