जैसा कि पहले ही चर्चा की जा चुकी है, शरीर आत्मा की इच्छाओं के अनुसार बनता है। आत्मा इच्छा करती है, और इस तरह शरीर बनता है। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (18.61) में कहते हैं:
īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ
hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati
bhrāmayan sarva-bhūtāni
yantrārūḍhāni māyayā
"हे अर्जुन, परमेश्वर सबके ह्रदय में निवास करते हैं, और मायारूपी यंत्र पर आरूढ़ सभी जीवों को नचा रहे हैं।" न तो परमात्मा और न ही व्यक्तिगत आत्मा अपनी मूल, आध्यात्मिक पहचान बदलते हैं। ātma शरीर की तरह जन्म, मृत्यु या परिवर्तन का अनुभव नहीं करता। इसलिए वैदिक सूत्र कहता है, asaṅgo hy ayaṁ puruṣaḥ: हालाँकि आत्मा इस भौतिक संसार में बंधी हुई है, पर उसका भौतिक शरीर के बदलाव से कोई संबंध नहीं होता है।
