श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  10.4.19 
भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च ।
नायमात्मा तथैतेषु विपर्येति यथैव भू: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में, हम देखते हैं कि मिट्टी के बर्तन, खिलौने और अन्य चीजें बनती हैं, टूटती हैं और फिर धरती में मिलकर नष्ट हो जाती हैं। ठीक उसी तरह, सभी जीवों के शरीर नष्ट हो जाते हैं, लेकिन पृथ्वी की तरह ही, जीव अपरिवर्तित रहते हैं और कभी नष्ट नहीं होते (न हन्यते हन्यमाने शरीरे)।
 
In this world we see that utensils, toys and other objects of the earth appear, break and then merge with the earth and disappear. Similarly, the bodies of conditioned souls keep on perishing, but like the earth, these souls remain unchanged and are never destroyed (na hanyate hanyamane sharire).
तात्पर्य
हालाँकि कंस को राक्षस के तौर पर जाना जाता है, पर उसे ātma-tattva, आत्म तत्व का अच्छा ज्ञान था। पाँच हज़ार साल पहले, कंस जैसे राजा हुआ करते थे, जिसे असुर के तौर पर जाना जाता है, पर वह आजकल के राजनीतिज्ञों और राजनयिकों से बेहतर था, जिन्हें ātma-tattva का कोई ज्ञान नहीं है। जैसा वेदों में लिखा है, asaṅgo hy ayaṁ puruṣaḥ:आत्मा का भौतिक शरीर के बदलाव से कोई संबंध नहीं होता है। शरीर में छः तरह के बदलाव होते हैं - जन्म, वृद्धि, पोषण, उपोत्पाद, ह्रास और अंत में विनाश - पर आत्मा में ऐसे कोई बदलाव नहीं होते। शरीर के रूपांतरण के बाद भी, शरीर के तत्वों का मूल स्रोत नहीं बदलता। जीव भौतिक शरीर का आनंद उठाता है, जो प्रकट और विलुप्त होता रहता है, पर पाँच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश वैसे ही बने रहते हैं। यहाँ जो उदाहरण दिया गया है कि घड़े और गुड़िया मिट्टी से बनाए जाते हैं, और जब टूट या नष्ट होते हैं तो अपने मूल तत्वों में मिल जाते हैं। किसी भी स्थिति में, आपूर्ति का स्रोत वही रहता है।

जैसा कि पहले ही चर्चा की जा चुकी है, शरीर आत्मा की इच्छाओं के अनुसार बनता है। आत्मा इच्छा करती है, और इस तरह शरीर बनता है। इसलिए कृष्ण भगवद-गीता (18.61) में कहते हैं:

īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ

hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati

bhrāmayan sarva-bhūtāni

yantrārūḍhāni māyayā

"हे अर्जुन, परमेश्वर सबके ह्रदय में निवास करते हैं, और मायारूपी यंत्र पर आरूढ़ सभी जीवों को नचा रहे हैं।" न तो परमात्मा और न ही व्यक्तिगत आत्मा अपनी मूल, आध्यात्मिक पहचान बदलते हैं। ātma शरीर की तरह जन्म, मृत्यु या परिवर्तन का अनुभव नहीं करता। इसलिए वैदिक सूत्र कहता है, asaṅgo hy ayaṁ puruṣaḥ: हालाँकि आत्मा इस भौतिक संसार में बंधी हुई है, पर उसका भौतिक शरीर के बदलाव से कोई संबंध नहीं होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)