श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 4: राजा कंस के अत्याचार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.4.17 
दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम् ।
यद्विश्रम्भादहं पाप: स्वसुर्निहतवाञ्छिशून् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
हाय! न केवल मनुष्य कभी-कभी झूठ बोलते हैं, बल्कि कभी-कभी तो विधाता भी झूठ बोलते हैं। और मैं इतना पापी हूँ कि मैंने विधाता के भविष्यवाणी पर विश्वास करके अपनी ही बहन के इतने सारे बच्चों की हत्या कर दी।
 
हाय! न केवल मनुष्य कभी-कभी झूठ बोलते हैं, बल्कि कभी-कभी तो विधाता भी झूठ बोलते हैं। और मैं इतना पापी हूँ कि मैंने विधाता के भविष्यवाणी पर विश्वास करके अपनी ही बहन के इतने सारे बच्चों की हत्या कर दी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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