श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  10.39.49-50 
बृहत्कटितटश्रोणिकरभोरुद्वयान्वितम् ।
चारुजानुयुगं चारुजङ्घायुगलसंयुतम् ॥ ४९ ॥
तुङ्गगुल्फारुणनखव्रातदीधितिभिर्वृतम् ।
नवाङ्गुल्यङ्गुष्ठदलैर्विलसत् पादपङ्कजम् ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
उनकी कमर और कूल्हे बहुत बड़े थे, जाँघें हाथी की सूँड़ जैसी और घुटने व पिंडलियाँ सुडौल थीं। उनके उठे हुए टखनों से उनके पाँव की उँगलियों के नाखून, जो फूलों की पंखुड़ियों के समान थे, से निकलने वाला चमकीला तेज परावर्तित होकर उनके चरणकमलों को सुंदर बना रहा था।
 
उनकी कमर और कूल्हे बहुत बड़े थे, जाँघें हाथी की सूँड़ जैसी और घुटने व पिंडलियाँ सुडौल थीं। उनके उठे हुए टखनों से उनके पाँव की उँगलियों के नाखून, जो फूलों की पंखुड़ियों के समान थे, से निकलने वाला चमकीला तेज परावर्तित होकर उनके चरणकमलों को सुंदर बना रहा था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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