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श्लोक 10.39.37  |
ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने ।
विशोका अहनी निन्युर्गायन्त्य: प्रियचेष्टितम् ॥ ३७ ॥ |
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| अनुवाद |
| तब गोपियाँ निराश होकर लौट आईं। उनमें आशा की किरण नहीं बची थी कि गोविन्द कभी उनके पास लौटेंगे। वे शोक-संताप्त होकर अपने प्रियतम की लीलाओं का जप करती हुईं अपने दिन और रातें बिताने लगीं। |
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| तब गोपियाँ निराश होकर लौट आईं। उनमें आशा की किरण नहीं बची थी कि गोविन्द कभी उनके पास लौटेंगे। वे शोक-संताप्त होकर अपने प्रियतम की लीलाओं का जप करती हुईं अपने दिन और रातें बिताने लगीं। |
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