श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.39.35 
तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तम: ।
सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकै: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
जब वे प्रस्थान करने लगे तो उन यदुकुल श्रेष्ठ ने देखा कि गोपियाँ किस प्रकार विलाप कर रही थीं। इसलिए उन्होंने एक दूत भेजकर उन्हें यह स्नेहपूर्ण वादा भेजा कि "मैं लौटूंगा" और इस प्रकार उन्हें सांत्वना प्रदान की।
 
जब वे प्रस्थान करने लगे तो उन यदुकुल श्रेष्ठ ने देखा कि गोपियाँ किस प्रकार विलाप कर रही थीं। इसलिए उन्होंने एक दूत भेजकर उन्हें यह स्नेहपूर्ण वादा भेजा कि "मैं लौटूंगा" और इस प्रकार उन्हें सांत्वना प्रदान की।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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