श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 39: अक्रूर द्वारा दर्शन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.39.28 
निवारयाम: समुपेत्य माधवं
किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवा: ।
मुकुन्दसङ्गान्निमिषार्धदुस्त्यजाद्
दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
चलो आइए हम सीधे माधव के पास जाएं और उन्हें जाने से रोकें। हमारे परिवार के बड़े-बूढ़े और अन्य रिश्तेदार हमारा क्या कर सकते हैं? अब जब कि भाग्य हमें मुकुन्द से अलग कर रहा है, हमारे दिल पहले से ही दुखी हैं क्योंकि हम उनके साथ एक पल के लिए भी सहन नहीं कर सकते।
 
Let us go straight to Madhava and prevent him from going. What can our elders and other relatives do to us? Now that fate is separating us from Mukunda, our hearts are already grieved because we cannot bear to give up his company even for a fraction of a moment.
तात्पर्य
श्रील विष्णुनाथ चक्रवर्ती वर्णन करते हैं कि गोपियों ने क्या सोचा था: ''आओ, हम कृष्ण के पास जाएं और उनके कपड़े और हाथ पकड़कर ज़ोर दे कि वह अपने रथ से उतरें और हमारे साथ यहीं रहें। हम उन्हें बताएँगी, 'तुम पर इतनी सारी स्त्रियों को मारने का पाप मत लो !' ''

''लेकिन अगर हमने ऐसा किया,'' अन्य गोपियों ने कहा, ''तो हमारे रिश्तेदार और गाँव के बड़े हमारे कृष्ण के लिए गुप्त प्रेम के बारे में पता कर लेंगे और हमें छोड़ देंगे।''

''लेकिन वे हमारे साथ क्या कर सकते हैं?''

''हाँ, अब कृष्ण के चले जाने पर हमारा जीवन पहले ही बर्बाद हो गया है। हमें खोने के लिए कुछ भी नहीं है।''

''सही है। हम वृंदावन के जंगल में देवी-देवताओं की तरह रहेंगे, और तब हम अपनी सच्ची इच्छा पूरी कर सकते हैं --कृष्ण के साथ जंगल में रहना।''

''हाँ, और चाहे बड़े और हमारे रिश्तेदार हमें पीटकर या हमें कैद करके दंडित करें, हम फिर भी इस ज्ञान के साथ खुशी से रह सकते हैं कि कृष्ण हमारे गांव में रह रहे हैं। हमारी कुछ सहेलियाँ जो कैद नहीं हैं, चतुराई से कृष्ण के भोजन के अवशेष लाने का कोई तरीका ढूंढ लेंगी, और फिर हम जीवित रह सकती हैं। लेकिन अगर कृष्ण को नहीं रोका गया, तो हम निश्चित रूप से मर जाएँगे।''

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)