अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं
तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदा: ।
गोपा अनोभि: स्थविरैरुपेक्षितं
दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते ॥ २७ ॥
अनुवाद
निष्ठुर कृष्ण पहले ही रथ पर बैठ चुके हैं और अब ये मूर्ख ग्वाले अपनी बैलगाड़ियों में उनके पीछे भाग रहे हैं। यहाँ तक कि बड़े-बूढ़े भी उन्हें रोकने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। आज का दिन हमारे विरुद्ध जा रहा है।
The ruthless Krishna has already mounted the chariot and now these foolish cowherds are in a hurry to follow Him in their bullock carts. Even the elders are not saying anything to stop them. Today fate is working against us.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी से जानते हैं कि गोपियों ने क्या सोचा: "ये मूर्ख ग्वाले और वृद्ध कृष्ण को रोकने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। क्या उन्हें एहसास नहीं है कि वे आत्महत्या कर रहे हैं? वे कृष्ण को मथुरा जाने में मदद कर रहे हैं, लेकिन उन्हें वृंदावन वापस आना पड़ेगा और उनकी अनुपस्थिति में ज़रूर मरना पड़ेगा। पूरी दुनिया बेकार हो गई है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥