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श्लोक 10.39.27  |
अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं
तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदा: ।
गोपा अनोभि: स्थविरैरुपेक्षितं
दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| निष्ठुर कृष्ण पहले ही रथ पर बैठ चुके हैं और अब ये मूर्ख ग्वाले अपनी बैलगाड़ियों में उनके पीछे भाग रहे हैं। यहाँ तक कि बड़े-बूढ़े भी उन्हें रोकने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। आज का दिन हमारे विरुद्ध जा रहा है। |
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| निष्ठुर कृष्ण पहले ही रथ पर बैठ चुके हैं और अब ये मूर्ख ग्वाले अपनी बैलगाड़ियों में उनके पीछे भाग रहे हैं। यहाँ तक कि बड़े-बूढ़े भी उन्हें रोकने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। आज का दिन हमारे विरुद्ध जा रहा है। |
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